गेंद, गुस्सा और दोस्ती
मेरा बचपन का एक दोस्त है, सत्यप्रकाश। कुछ लोग जीवन में ऐसे होते हैं, जिनका नाम भर मन में आते ही भीतर कहीं उजाला-सा फैल जाता है। चेहरा दमकने लगता है, जैसे किसी ने वक्त की अलमारी से बचपन का कोई प्रिय खिलौना निकालकर सामने रख दिया हो। सत्यप्रकाश मेरे लिए ऐसा ही नाम है। आज यूँ ही बैठे-बैठे उसकी याद आ गई। न कोई विशेष प्रसंग था, न कोई तय कारण। सच तो यह है कि स्मृतियाँ बड़ी मनमौजी होती हैं, कभी किसी गंध से, कभी किसी दृश्य से, कभी किसी आवाज़ से, कभी किसी छुअन से कभी किसी आवाज से, और कभी बिल्कुल अनायास बिना निमंत्रण के चली आती हैं। आज जब सत्यप्रकाश याद आया, तो उसके साथ बचपन की एक घटना भी याद आ गई। उस समय वह घटना बहुत गंभीर लगी थी, लगभग जैसे दो राज्यों के बीच लड़ाई का बिगुल बज गया हो। लेकिन आज, इतने वर्षों बाद, पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह झगड़ा नहीं, जीवन की सबसे खूबसूरत घटनाओं में से एक था; शायद इसलिए कि उसी ने एक ऐसी दोस्ती की नींव रखी, जो समय की धूप-छाँव झेलते हुए भी बनी रही। मैं शायद छठी कक्षा में पढ़ता था। उम्र रही होगी यही कोई दस-ग्यारह साल की। उन दिनों मेरे सिर पर हॉकी का जुन...