गेंद, गुस्सा और दोस्ती

मेरा बचपन का एक दोस्त है, सत्यप्रकाश।

कुछ लोग जीवन में ऐसे होते हैं, जिनका नाम भर मन में आते ही जिनका नाम भर मन में आते ही भीतर कहीं एक उजाला-सा फैल जाता है। चेहरे पर अपने-आप मुस्कान आ जाती है, जैसे किसी ने वक्त की अलमारी से बचपन का कोई प्रिय खिलौना निकालकर सामने रख दिया हो। सत्यप्रकाश मेरे लिए ऐसा ही नाम है। आज यूँ ही बैठे-बैठे उसकी याद आ गई। न कोई विशेष प्रसंग था, न कोई तय कारण। स्मृतियाँ भी बड़ी मनमौजी होती हैं, कभी किसी गंध से, कभी किसी आवाज़ से, कभी किसी चुप्पी से, और कभी बिल्कुल बिना निमंत्रण के चली आती हैं।

आज जब सत्यप्रकाश याद आया, तो उसके साथ बचपन की वह घटना भी याद आ गई, जिससे हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई थी। उस समय वह घटना बहुत गंभीर लगी थी, लगभग जैसे दो राज्यों के बीच युद्ध की घोषणा हो गई हो। लेकिन आज, इतने वर्षों बाद, पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह झगड़ा नहीं, जीवन की सबसे खूबसूरत घटनाओं में से एक था; शायद इसलिए कि उसी ने एक ऐसी दोस्ती की नींव रखी, जो समय की धूप-छाँव झेलते हुए भी बनी रही।

बात उन दिनों की है, जब मैं शायद छठी कक्षा में पढ़ता था। उम्र रही होगी दस-ग्यारह साल की। उन दिनों मेरे सिर पर हॉकी का ऐसा जुनून सवार था कि हाथ में हॉकी स्टिक आते ही मुझे अपने भीतर मेजर ध्यानचंद की आत्मा उतरती हुई महसूस होती थी। मैदान तक जाने का रास्ता भी मुझे मैदान ही लगता था। घर से निकलता तो सड़क पर ही गेंद को ड्रिब्लिंग करते हुए आगे बढ़ने लगता। न ट्रैफिक का इतना डर था, न जीवन इतना अनुशासित और सतर्क। छोटे शहरों की गलियाँ बच्चों की आवाज़ों, खेलों, झगड़ों, मेल-मिलाप और बेफिक्रियों से भरी रहती थीं।

उस दिन भी मैं घर से फील्ड की ओर निकला था। हाथ में हॉकी स्टिक थी, सामने गेंद थी और मन पूरी तरह खेल में डूबा हुआ था। सड़क पर गेंद को आगे-पीछे करता हुआ मैं अपनी ही दुनिया में चला जा रहा था। मेरे आगे एक दुबला-पतला-सा लड़का चल रहा था। मैं शायद अपनी ड्रिब्लिंग में इतना मग्न था कि आस-पास की दुनिया थोड़ी धुँधली पड़ गई थी। अचानक मेरा ध्यान हटा और गेंद जाकर उस लड़के के पैर से छू गई।

वह तुरंत पलटा। जितनी तेजी से वह पलटा, उससे कहीं अधिक तेजी से उसके मुँह से एक गाली निकली। मुज़फ्फरनगर के माहौल में यह कोई बहुत असाधारण बात भी नहीं है। वहाँ की भाषा में एक अलग ही देसी ठसक है। बात शुरू हो या न हो, स्वर पहले ऊँचा हो जाता है। भावनाएँ शब्दों से तेज़ दौड़ती है और शब्द, कई बार, शिष्टाचार से भी तेज़।

उसके मुँह में गाली थी और मेरे हाथ में हॉकी स्टिक। अब सोचता हूँ तो दृश्य थोड़ा हास्यास्पद भी लगता है और थोड़ा स्नेहपूर्ण भी। दो छोटे लड़के, एक अपनी चोटिल नाराज़गी में खड़ा था और दूसरा अपनी खेल वाली अकड़ में। हम दोनों को उस समय अवश्य लगा होगा कि मामला अत्यन्त गंभीर है और संसार की शान्ति अब हमारे निर्णय पर निर्भर करती है। बचपन में आत्मसम्मान भी जल्दी आहत हो जाता है और वीरता भी बहुत जल्दी जाग जाती है, भले ही ऊँचाई स्कूल बैग से कुछ ही अधिक क्यों न हो।

सौभाग्य से बात आगे नहीं बढ़ी। मुझे आज भी याद है कि कोई मारपीट नहीं हुई। रास्ते से गुजरते कुछ बड़े और जिम्मेदार सीनियर लड़कों ने बीच-बचाव करा दिया। उन्होंने शायद हमें डाँटा भी होगा, समझाया भी होगा और अपने ढंग से इस छोटे-से महाभारत को वहीं रोक दिया होगा। हाँ, जाते-जाते एक-दूसरे को “देख लेने” की धमकियाँ अवश्य दी गईं। उस उम्र में “देख लेने” का अर्थ भी कितना विशाल लगता था! जैसे कोई ऐतिहासिक बदला बाकी रह गया हो।

आज सोचता हूँ तो हँसी आ जाती है। दस-ग्यारह साल के दो लड़के आखिर एक-दूसरे को क्या ही देख लेते! अधिक से अधिक अगले मोड़ पर फिर मिलते, दो मिनट घूरते, और फिर शायद किसी इमली या बर्फ के गोले के आगे सारी दुश्मनी भूल जाते। बचपन की दुनिया में छोटी-छोटी घटनाएँ भी बहुत बड़ी हो जाती हैं। एक गेंद का पैर से छू जाना, एक गाली का निकल जाना, एक नज़र का बदल जाना- सब कुछ तत्काल इतिहास बन जाता है। उस समय लगता है कि दुश्मनी स्थायी है। पर सच तो यह है कि बचपन की नाराज़गियाँ रेत पर लिखी पंक्तियों जैसी होती हैं; थोड़ी-सी हवा चली और वे गायब।

कुछ सप्ताह बीते होंगे। मेरे एक मित्र थे नंदकिशोर। वे शायद हमारे बीच शान्ति-स्थापना मिशन लेकर आए थे। मित्रों की दुनिया में भी कुछ लोग पुल बनाते हैं; नंदकिशोर उन्हीं में से थे। उन्होंने हमारी इस बाल-सुलभ दुश्मनी को समाप्त करने की ठानी और हमें फिर से मिलवाया। कोई औपचारिक पंचायत नहीं बैठी, कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ, कोई क्षमायाचना-पत्र नहीं लिखा गया। बस हम मिले।

और सबसे सुंदर बात यह रही कि पिछली लड़ाई की चर्चा तक नहीं हुई। न मैंने कहा कि गेंद गलती से लगी थी, न उसने कहा कि गाली अनायास निकल गई थी। न किसी ने माफी माँगी, न किसी ने हिसाब माँगा। बस जैसे बचपन ने अपने ढंग से निर्णय कर लिया कि झगड़ा अब बेकार है और दोस्ती अधिक लाभकारी सौदा है। बच्चों में यह अद्भुत क्षमता होती है कि वे बिना घोषणा के क्षमा कर देते हैं और बिना भाषण के आगे बढ़ जाते हैं।

उस मुलाकात के बाद जो रिश्ता शुरू हुआ, वह धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गया। फिर वही गलियाँ, वही मैदान, वही स्कूल के दिन, वही हँसी-मज़ाक। शायद हमने साथ खेला होगा, साथ घूमे होंगे, कभी बहस की होगी, कभी फिर रूठे भी होंगे। पर वह पहली तकरार अब मन में किसी कटुता की तरह नहीं, बल्कि एक मीठी स्मृति की तरह बस गई है। आज लगता है कि वह गेंद केवल उसके पैर से नहीं लगी थी; उसने शायद मेरे जीवन में एक मित्रता का दरवाज़ा भी खोल दिया था।

अब लगभग पचास वर्ष बीत चुके हैं। इतने वर्षों में जीवन ने अपने-अपने रास्ते दिए। समय ने दायित्व दिए, दूरियाँ दीं, व्यस्तताएँ दीं। हम अपने-अपने संसारों में आगे बढ़ते गए। पर कुछ रिश्ते अजीब होते हैं, वे रोज़-रोज़ की बातचीत पर निर्भर नहीं रहते। उन्हें प्रतिदिन पानी देने की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी उनकी जड़ें भीतर कहीं बहुत गहराई तक जीवित रहती हैं।

आज महीनों तक मुलाकात नहीं होती। कभी-कभी बात भी लंबे अंतराल के बाद होती है। पर जब भी सत्यप्रकाश का ध्यान आता है, या उससे बात होती है, तो लगता है कि दोस्ती कहीं कम नहीं हुई है। उलटे, उसमें समय की परिपक्वता घुल गई है। जैसे कोई पुराना स्वाद, जो उम्र के साथ और सधा हुआ हो जाता है। जैसे स्कॉच की सीज़निंग; धीरे-धीरे, चुपचाप, अपनी गहराई बढ़ाती हुई। फर्क बस इतना है कि स्कॉच लकड़ी के पीपे में रहती है, और ऐसी दोस्तियाँ स्मृति के भीतर।

सत्यप्रकाश मेरे लिए केवल बचपन का मित्र नहीं है। वह इस बात का प्रमाण है कि जीवन की कई गहरी मित्रताएँ किसी औपचारिक परिचय से नहीं, बल्कि संयोग से शुरू होती हैं। कभी सड़क पर गेंद लग जाने से, कभी किसी गाली से, कभी किसी बचकानी धमकी से, और कभी किसी नंदकिशोर जैसे मित्र के शांत मध्यस्थत्व से। जीवन भी कभी-कभी बड़ा चतुर कथाकार होता है, झगड़े से कहानी शुरू करता है और अन्त में उसे दोस्ती बना देता है।

आज उस घटना को याद करता हूँ, तो लगता है कि यदि उस दिन वह गेंद उसके पैर से न टकराती, यदि वह पलटकर गाली न देता, यदि मेरे हाथ में हॉकी स्टिक न होती, यदि सीनियर लड़के बीच-बचाव न करते, यदि नंदकिशोर हमें दोबारा न मिलवाते तो शायद जीवन की एक सुंदर दोस्ती जन्म ही न लेती। कितनी छोटी-सी घटना थी, पर स्मृति में कितनी बड़ी जगह घेरकर बैठी है!

कभी-कभी सोचता हूँ, बचपन सचमुच कितना उदार समय होता है। वह हमारी मूर्खताओं को भी स्मृतियों में बदल देता है, हमारी अकड़ को हँसी में, और हमारी लड़ाइयों को रिश्तों में। जो बात तब अपमान लगती थी, वही आज अपनापन लगती है। जो घटना तब संकट लगी थी, वही अब मन के सबसे कोमल कोनों में रखी हुई है।

कितनी अद्भुत बात है कि उस समय जो घटना झगड़े की तरह शुरू हुई थी, वही आज स्मृति में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की तरह चमकती है कि ऐसा हुआ। बचपन के झगड़े, छोटे शहरों की सड़कें, हॉकी की गेंद, हाथ की स्टिक, गुस्से में निकली गाली, और फिर बिना शब्दों के हो गया मेल; इन सबने मिलकर एक दोस्ती की नींव रख दी।

वह है। मैं हूँ। और हमारे बीच वह दोस्ती है, जो समय के साथ पुरानी नहीं हुई; बस और पकी है, और गहरी हुई है, और पहले से अधिक अपनी लगने लगी है। शायद दोस्ती का असली सौन्दर्य यही है कि वर्षों बाद भी किसी का नाम लेते ही मन कहे- “अरे, यह तो अपना है।”

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